21 दिसंबर 2011

२१. नया पुराना

जीवन का ये ही अफसाना
राग नया है, साज पुराना

शहरों की गति परिचित सी है,
पथ सारे जाने-पहचाने,
पंख मिले हैं हम सब को पर
भूल गए है पर फैलाना

रिश्तों के सोते सूखे हैं
घर-अपने पीछे छूटे हैं
पैसे की दीमक ने घर में
शुरू किया दीवारें खाना

माँ–बाबूजी अब गाँवों में
बेटे शहरों के बाशिंदे
मोबाइल पर ही होता है
रिश्तों का संवाद निभाना

केशवेन्द्र कुमार
सीतामढ़ी से

5 टिप्‍पणियां:

  1. साधुवाद भाई केशवेन्द्र कुमार जी को जिनका यह गीत नवगीत की भंगिमा के बहुत नज़दीक है| हालाँकि यह मुकम्मिल नवगीत नहीं बन पाया है, फिर भी कुछ पंक्तियाँ तो अत्यंत सुखद हैं यथा -
    'पंख मिले हैं हम सब को पर/ भूल गए है पर फैलाना', 'रिश्तों के सोते सूखे हैं','पैसे की दीमक ने घर में/ शुरू किया दीवारें खाना', 'मोबाइल पर ही होता है / रिश्तों का संवाद निभाना'

    उत्तर देंहटाएं
  2. Nav geet kuch adhuuraa sa hai fir bhi bahut su-ndar manmohk laga naye kalevar me.badhai bhai Keshvendra ko. Prabhudayal

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बहुत बधाई केशवेंद्र जी को इस सुंदर नवगीत के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  4. विमल कुमार हेडा23 दिसंबर 2011 को 8:15 am

    माँ–बाबूजी अब गाँवों में
    बेटे शहरों के बाशिंदे
    मोबाइल पर ही होता है
    रिश्तों का संवाद निभाना
    सुन्दर पंक्तियाँ, केशवेन्द्र कुमार जी को बहुत बहुत बधाई
    धन्वयाद,
    विमल कुमार हेडा

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आप सबों का शुक्रिया. पूरा नवगीत मूल रूप में आप लोगों के सामने पेश है-
      "जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना ||

      जीवन की गति परिचित सी है,
      पथ सारे जाने-पहचाने,
      पंख मिले हैं हम सब को,
      पर भूल गए है पर फैलाना |

      जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना ||

      रिश्तों के सोते सूखे हैं,
      घर-अपने पीछे छूटे हैं ,
      पैसे की दीमक ने शुरू किया है,
      घर की दीवारों को खाना |

      जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना ||

      माँ –बाबूजी अब गाँवों में,
      बेटे शहरों के बाशिंदे;
      मोबाइल पर ही अब तो
      चलता है रिश्तों का निभाना |

      जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना ||

      पिज्जा से अब भूख मिटे है
      और पेप्सी से प्यास,
      शायद बच्चे भूल ना जाये
      कैसा होता माँ का खाना |

      जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना ||

      फेसबुकी इस दुनिया में अब
      मिलना भी आभासी है,
      जीने को मुल्तवी करते, करके
      ‘फुर्सत नहीं है’ का बहाना |

      जीवन का ये ही अफसाना |
      राग नया है, साज पुराना || "

      हटाएं

आपकी टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है। कृपया देवनागरी लिपि का ही प्रयोग करें।