18 मार्च 2013

८. और... रंग में भीगे दिन

और...
रंग में भीगे दिन ये क्या आये
हम बौराये

दिन पद्माकर
रातें देव-बिहारी हैं
उषा-सुन्दरी
हुईं दिशाएँ सारी हैं

हर पल-छिन
आलिंगन माँगे - होली गाये
हम बौराये


इंद्रधनुष-फूलों पर
भौरों की गुनगुन
गूँज रही साँसों में
मीठी वंशीधुन

पहली रितु की
याद जगी ख़ुद को बिसराये
हम बौराये

देखो सजनी,
हवा हुई वृन्दावन है
खिली चाँदनी लगती
रोली-चन्दन है

सूरज ने
हर घाटी में गुलाल बिखराये
हम बौराये

-कुमार रवीन्द्र
(हिसार)

6 टिप्‍पणियां:

  1. मधुर अनुगूँज से मन को लुभाता हुआ अति सुंदर नवगीत....

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  2. बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  3. परमेश्वर फूंकवाल19 मार्च 2013 को 8:39 pm

    इस गीत पर कुछ कहना सूरज को रोशनी दिखाना है ..."इंद्रधनुष-फूलों पर
    भौरों की गुनगुन
    गूँज रही साँसों में
    मीठी वंशीधुन

    पहली रितु की
    याद जगी ख़ुद को बिसराये
    हम बौराये " यह पंक्तियाँ किसी को भी सब कुछ बिसरा देने को मजबूर कर सकती हैं ...जादुई है आपकी कलम. आपको नमन.

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  4. अनिल वर्मा, लखनऊ.20 मार्च 2013 को 8:52 am

    देखो सजनी,
    हवा हुई वृन्दावन है
    खिली चाँदनी लगती
    रोली-चन्दन है
    हमेशा की तरह अतिसुन्दर नवगीत पढ़वाने के लिये हार्दिक धन्यवाद.

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  5. एक सुन्दर नवगीत , सदा की तरह ...
    देखो सजनी,
    हवा हुई वृन्दावन है
    खिली चाँदनी लगती
    रोली-चन्दन है ........

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